Search your topic

Monday, April 12, 2021

silence

एक प्रदीप्त ज्वाला
कई जन्मों से मेरे इर्द गिर्द-
चक्कर काटती....!
हर भेष में मुझे जीने की प्रेरणा देती...
पाशविक प्रलोभन से बचाती...!

जीवन के शोर शराबे-
कभी अनहद खामोशी में चीखती...
कभी मेरी आत्मा पर हज़ार मन बोझ डालती
कभी सेमल के फूल सी हल्की....
मुझे मेरी दुनिया दे दूर...
जाने कहाँ लिये जाती....!

मैं कौन हूँ....? क्या हूँ!!
प्रकृति के हर मौसम में....
मेरा नाम लिखती...!!

तन्हा रहूँ या कि भीड़ में...
मुझे उर्जा प्रदान करती रहती.
मेरे प्राकृतिक रूप को.......
नारीत्व के सम्पूर्ण विभूतियों से सँवारती....!
.
तब मैं....कहीं इस ठोस जमीं पर खड़ी रह पाती....
हर पल संघर्षरत.....!!!

No comments:

Post a Comment

Eclipse,EarthDay

FOCUS, LEARN AND GROW

 The Trilogy of Transformation: Focus, Learn, and Grow We live in a world that constantly demands our attention, yet rarely offers us direct...