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Sunday, April 11, 2021

Understanding

 "समझ न सकोगे तुम मेरी उल्झनों को....

हाँ...! तुम निकालना भी चाहो ...
तो-
क्या करोगे इन परछाइयों का....
जो मेरी अंतरात्मा की तहों तक छाईं है...!
एक नहीं कई दर परत -
बाहें फैलाए है...और-
जैसे मेरे कितनी जन्मों की कथा
कहती है..!"



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